Judiciary Hindi- 6
Total varnas in Hindi: 52
Swar: 11
Vyanjan: 33
Twigun Vyanjan: 2
Sayunkt Vyanjan: 4
Ayogvah: 2
Total: 52
स्वरों के भेद : – उच्चारण समय या मात्रा के आधार पर स्वरो के तीन भेद है।
हस्व स्वर : – इन्हे मूल स्वर तथा एकमात्रिक स्वर भी कहते है। इनके उच्चारण में सबसे कम समय लगता है। जैसे – अ, इ, उ, ऋ ।
दीर्घ स्वर : – इनके उच्चारण में कस्य स्वर की अपेक्षा दुगुना समय लगता है अर्थात दो मात्राए लगती है, उसे दीर्घ स्वर कहते है। जैसे – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ ।
प्लुत स्वर : – संस्कृत में प्लुत को एक तीसरा भेद माना जाता है, पर हिन्दी में इसका प्रयोग नहीं होता जैसे – ओउम् ।
प्रयत्न के आधार पर: – जीभ के प्रयत्न के आधार पर तीन भेद है।
अग्र स्वर : – जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का अगला भाग ऊपर नीचे उठता है, अग्र स्वर कहते है जैसे – इ, ई, ए, ऐ ।
पश्च स्वर : – जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का पिछला भाग सामान्य स्थिति से उठता है, पश्च स्वर कहे जाते जैसे – ओ, उ, ऊ, ओ, औ तथा ऑ ।
मध्य स्वर : – हिन्दी में ‘अ’ स्वर केन्द्रीय स्वर है। इसके उच्चारण में जीभ का मध्य भाग थोड़ा – सा ऊपर उठता है।
मुखाकृति के आधार पर :
संवृत : – वे स्वर जिनके उच्चारण में मुँह बहुत कम खुलता है। जैसे – इ, ई, उ, ऊ।
अर्द्ध संवृत : – वे स्वर जिनके उच्चारण में मुख संवृत की अपेक्षा कुछ अधिक खुलता है जैसे – ए, ओ ।
विवृत : – जिन स्वरों के उच्चारण में मुख पूरा खुलता है। जैसे – आ ।
अर्द्ध विवृत : – जिन स्वरों के उच्चारण में मुख आधा खुलता है। जैसे – अ, ऐ, औ।
ओष्ठाकृति के आधार पर :
वृताकार : – जिनके उच्चारण में होठो की आकृति वृत के समान बनती है। जैसे – उ, ऊ, ओ, औ ।
अवृताकार : – इनके उच्चारण में होठो की आकृति अवृताकार होती है। जैसे – इ, ई, ए, ऐ ।
उदासीन : – ‘अ’ स्वर के उच्चारण में होठ उदासीन रहते है।
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